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व्यर्थ हुए सब वाद विवाद………. नहीं उर में अपनापन आया
हो वसुधा न कुटुम्ब सकी निज शील बचा न सकी लख जाया
मानवधर्म न जान सका……. इतना भटका भटकी कब माया
क्यों धरती पर जन्म लिया… मन आज विचार बड़ा पछताया
रचनाकार

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